शनिवार की शाम आईएसबीटी पंहुचा देखा तो बदला बदला सा बस अड्डा लग रहा था. खैर बस अड्डे का अन्दर पुह्चा तो जहा वेटिंग रूम था पूरा का पूरा वातानुकूलित था. बहुत अच्छा लग रहा था. थोड़ा बाहर आया तो उत्तराखंड बस का कंडक्टर आवाज लगा रहा थ. कोटद्वार-कोटद्वार। मैंने तुरंत भाग कर कंडक्टर से पूछा की बस मैं सीट खाली है. तो उसने कहा की अभी तो खाली है लेकिन थोड़ी देर मैं सीट भर जायगी से कोटद्वार की बस पकड़ कर
लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है
उत्तराखंड के लोक गीत, लोक कलाये, वेशभूषा, खानपान, त्यौहार, रहन-सहन सब अपने आप मे अनुठा है और लोगो को अपनी और आकर्षित करता है परंतु इस सब के बावजूद लोगो का पलायन जारी है . इस सब से हट देखे तो यहा की लोक कलाएँ भी सबसे खास है. लोक कलाएँ लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण (अल्पना) बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है। चावल को भिगोकर उसे पीसा जाता है। उसके लेप से आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं। विभिन्न अवसरों पर नामकरण चौकी, सूर्य चौकी, स्नान चौकी, जन्मदिन चौकी, यज्ञोपवीत चौकी, विवाह चौकी, धूमिलअर्ध्य चौकी, वर चौकी, आचार्य चौकी, अष्टदल कमल, स्वास्तिक पीठ, विष्णु पीठ, शिव पीठ, शिव शक्ति पीठ, सरस्वती पीठ आदि परम्परागत रूप से गाँव की महिलाएँ स्वयं बनाती है। इनका कहीं प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। हरेले आदि पर्वों पर मिट्टी के डिकारे बनाए जा...
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